कार्यक्षेत्र
सिविल एवं सम्पत्ति विधि (दीवानी)
अन्य नाम: दीवानी · Diwani · सम्पत्ति का वकील बरेली
इस चैंबर में सिविल एवं सम्पत्ति सम्बन्धी कार्य के अंतर्गत स्वत्व एवं घोषणा वाद, बँटवारा, कब्जे हेतु वाद, स्थायी एवं अस्थायी निषेधाज्ञा तथा स्थगन आदेश, बरेली के सिविल जज एवं जिला जज के समक्ष दाखिल किए जाते हैं। एक महत्वपूर्ण बिन्दु जो उत्तर प्रदेश के अनेक सम्पत्ति विवादों का क्षेत्राधिकार तय करता है: कृषि भूमि से सम्बन्धित मामले प्रायः उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 के अंतर्गत राजस्व न्यायालयों में जाते हैं, सिविल न्यायालय में नहीं।
इस कार्यक्षेत्र में सम्मिलित कार्य
स्वत्व एवं घोषणा वाद
स्वत्व की घोषणा तथा विलेखों के निरस्तीकरण हेतु वाद, जिसमें कूटरचित बताए गए अथवा दुर्व्यपदेशन से निष्पादित विक्रय विलेख, दान विलेख एवं वसीयत को चुनौती सम्मिलित है।
बँटवारा
संयुक्त परिवार एवं सह-स्वामित्व वाली सम्पत्ति के बँटवारे हेतु वाद तथा अंशों का निर्धारण।
कब्जा एवं निषेधाज्ञा
- कब्जे हेतु वाद स्वत्व के आधार पर (अनुच्छेद 65, परिसीमा अधिनियम — बारह वर्ष)।
- स्थायी निषेधाज्ञा विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 38 के अंतर्गत।
- अस्थायी निषेधाज्ञा एवं स्थगन आदेश आदेश 39 नियम 1 एवं 2 सी.पी.सी. के अंतर्गत।
- विनिर्दिष्ट पालन हेतु वाद, बैनामे के इकरारनामे के आधार पर।
क्षेत्राधिकार का प्रश्न — जो अनेक मामलों को तय करता है
यह उत्तर प्रदेश के सम्पत्ति विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रारम्भिक निर्णय है।
| विवाद की प्रकृति | सही न्यायालय |
|---|---|
| कृषि भूमि — भूमिधरी अधिकारों की घोषणा | राजस्व न्यायालय (उ.प्र. राजस्व संहिता 2006) |
| कृषि भूमि — जोतों का विभाजन | राजस्व न्यायालय |
| खतौनी/राजस्व अभिलेखों में संशोधन | राजस्व न्यायालय (तहसीलदार) |
| चकबन्दी के अधीन भूमि | चकबन्दी अधिकारी |
| शहरी/आबादी सम्पत्ति — स्वत्व एवं कब्जा | सिविल न्यायालय |
| पंजीकृत विक्रय विलेख का निरस्तीकरण | सिविल न्यायालय |
| बैनामे के इकरारनामे का विनिर्दिष्ट पालन | सिविल न्यायालय |
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 331, अनुसूची II सहपठित, सिविल न्यायालय को उन मामलों की सुनवाई से वर्जित करती है जो संहिता राजस्व न्यायालयों को सौंपती है। गलत न्यायालय में दाखिल वाद वर्षों बाद वापस हो सकता है, और तब तक सही उपचार पर परिसीमा समाप्त हो चुकी हो सकती है।
प्रायः लागू होने वाली परिसीमा अवधियाँ
| अनुतोष | अनुच्छेद | अवधि | कब से |
|---|---|---|---|
| स्वत्व के आधार पर कब्जा | 65 | 12 वर्ष | कब्जा प्रतिकूल होने से |
| घोषणा | 58 | 3 वर्ष | वाद हेतुक उत्पन्न होने से |
| विनिर्दिष्ट पालन | 54 | 3 वर्ष | निष्पादन हेतु नियत तिथि से |
| कपट से प्राप्त डिक्री निरस्त कराना | 59 | 3 वर्ष | कपट ज्ञात होने से |
परिसीमा कोई तकनीकी बात नहीं है जिसे बाद में तर्क से पार किया जा सके। यदि विवाद कुछ समय से चल रहा है, तो सबसे पहले वाद हेतुक की तिथि निर्धारित करनी चाहिए।
लाने योग्य दस्तावेज
- विक्रय विलेख, दान विलेख, वसीयत अथवा अन्य सम्बन्धित विलेख
- कृषि भूमि हेतु खतौनी की प्रमाणित प्रति
- दाखिल-खारिज के अभिलेख तथा लगान/गृहकर की रसीदें
- मामले में पूर्व के आदेश, डिक्री अथवा नोटिस
- पूर्ववर्ती पंजीकृत दस्तावेजों के माध्यम से स्वत्व की शृंखला
सामान्य प्रश्न
कृषि भूमि का विवाद सिविल न्यायालय में जाएगा या राजस्व न्यायालय में?
उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि से सम्बन्धित विवाद — भूमिधरी अधिकारों की घोषणा, जोतों का विभाजन, राजस्व अभिलेखों में संशोधन — प्रायः उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 के अंतर्गत तहसीलदार, उपजिलाधिकारी अथवा कलेक्टर के समक्ष जाते हैं। धारा 331 सहपठित अनुसूची II द्वारा सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार वर्जित है। गलत न्यायालय में वाद दाखिल करने से वर्षों का समय नष्ट होता है।
सम्पत्ति सम्बन्धी वाद दाखिल करने की समय सीमा क्या है?
परिसीमा अधिनियम 1963 के अंतर्गत, स्वत्व के आधार पर कब्जे का वाद प्रतिवादी का कब्जा प्रतिकूल होने के बारह वर्ष के भीतर दाखिल होना चाहिए (अनुच्छेद 65)। घोषणा का वाद वाद हेतुक उत्पन्न होने के तीन वर्ष के भीतर (अनुच्छेद 58)। कपट के आधार पर विक्रय विलेख निरस्त कराने का वाद कपट ज्ञात होने से तीन वर्ष।
अस्थायी और स्थायी निषेधाज्ञा में क्या अंतर है?
अस्थायी निषेधाज्ञा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 नियम 1 एवं 2 के अंतर्गत अंतरिम आदेश है, जो वाद लम्बित रहते स्थिति बनाए रखने हेतु दिया जाता है। स्थायी निषेधाज्ञा विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 38 के अंतर्गत वाद के विचारण के पश्चात डिक्री द्वारा दी जाने वाली अंतिम राहत है।
बरेली में सम्पत्ति खरीदने से पूर्व क्या जाँचना चाहिए?
कम से कम पिछले तीस वर्षों के पंजीकृत दस्तावेजों के माध्यम से स्वत्व की शृंखला देखें; कृषि भूमि हेतु वर्तमान खतौनी की प्रमाणित प्रति प्राप्त करें; उप-निबन्धक कार्यालय में भार सम्बन्धी जाँच कराएँ; भूमि उपयोग की पुष्टि करें; तथा यह सुनिश्चित करें कि कोई वाद अथवा कुर्की लम्बित न हो।