इस चैंबर में वैवाहिक कार्य के अंतर्गत विवादित एवं आपसी सहमति से तलाक, धारा 144 बी.एन.एस.एस. तथा हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत भरण-पोषण, बच्चों की अभिरक्षा एवं संरक्षकता, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 के अंतर्गत कार्यवाही, तथा भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 एवं 86 के अंतर्गत क्रूरता के मामलों में बचाव सम्मिलित है। अधिकांश मामले परिवार न्यायालय, बरेली में सुने जाते हैं।

इस कार्यक्षेत्र में सम्मिलित कार्य

तलाक

  • विवादित तलाक — हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अंतर्गत, क्रूरता, दो वर्ष या अधिक का अभित्याग, धर्म परिवर्तन तथा अन्य आधारों पर।
  • आपसी सहमति से तलाक — धारा 13B के अंतर्गत, दो प्रस्तावों सहित।
  • न्यायिक पृथक्करण धारा 10 के अंतर्गत, तथा विवाह शून्यता धारा 11 एवं 12 के अंतर्गत।
  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अंतर्गत कार्यवाही, जहाँ विवाह उसी अधिनियम के अंतर्गत सम्पन्न हुआ हो।

भरण-पोषण एवं गुजारा भत्ता

उपचार प्रावधान कौन दावा कर सकता है
कार्यवाही के दौरान अंतरिम भरण-पोषण हि.वि.अ. धारा 24 कोई भी पक्षकार
स्थायी गुजारा भत्ता हि.वि.अ. धारा 25 कोई भी पक्षकार
भरण-पोषण (संक्षिप्त उपचार) बी.एन.एस.एस. 144 पत्नी, संतान, माता-पिता
आर्थिक राहत घ.हिं.अ. धारा 20 पीड़ित महिला

धारा 144 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत उपचार आदेश प्राप्त करने का सबसे शीघ्र मार्ग है और धर्म से निरपेक्ष रूप से उपलब्ध है।

बच्चों की अभिरक्षा एवं संरक्षकता

संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 तथा हिन्दू अल्पवयस्कता एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 के अंतर्गत अभिरक्षा, संरक्षकता एवं मिलने के अधिकार हेतु आवेदन। उच्चतम न्यायालय द्वारा बार-बार दोहराया गया सिद्धांत यह है कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है

घरेलू हिंसा सम्बन्धी कार्यवाही

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के अंतर्गत संरक्षण आदेश (धारा 18), निवास आदेश (धारा 19), आर्थिक राहत (धारा 20), अभिरक्षा आदेश (धारा 21) तथा प्रतिकर (धारा 22) हेतु आवेदन — तथा ऐसे आवेदनों में बचाव।

क्रूरता के मामलों में बचाव (पूर्व में धारा 498A)

धारा 85 एवं 86 बी.एन.एस. के अंतर्गत कार्यवाही में बचाव, जिसमें अग्रिम जमानत, जमानत, तथा यथोचित स्थिति में धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत निरस्तीकरण याचिका सम्मिलित है।

उच्चतम न्यायालय ने अर्नेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार में निर्धारित किया कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में पुलिस स्वतः गिरफ्तारी न करे तथा पहले उपस्थिति का नोटिस दे — जो अब धारा 35 बी.एन.एस.एस. है।

व्यावहारिक बातें

  • दस्तावेज: विवाह का प्रमाण, पृथक्करण की तिथि का प्रमाण, दोनों पक्षों की आय सम्बन्धी अभिलेख, बच्चों के विद्यालय एवं चिकित्सीय अभिलेख।
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य — सन्देश, कॉल रिकॉर्डिंग — के लिए अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत प्रमाणपत्र आवश्यक है। मूल उपकरण सुरक्षित रखें।
  • मध्यस्थता अधिकांश परिवार न्यायालय मामलों में प्रयास की जाती है और प्रायः शीघ्र एवं कम खर्चीला मार्ग होती है।

सामान्य प्रश्न

आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13B के अंतर्गत याचिका में दो प्रस्ताव आवश्यक हैं, जिनके बीच छह माह की वैधानिक अवधि होती है, जो अठारह माह तक बढ़ाई जा सकती है। उच्चतम न्यायालय ने माना है कि परिवार न्यायालय लम्बे पृथक्करण एवं वास्तविक समझौते की स्थिति में छह माह की अवधि माफ कर सकता है, किन्तु यह विवेकाधीन है। व्यवहार में बरेली में यह प्रायः छह से बारह माह लेता है।

धारा 498A अब कौन सी धारा है?

विवाहिता के साथ उसके पति अथवा पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 एवं 86 के अंतर्गत आती है, जो 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुई। धारा 85 अपराध बनाती है और धारा 86 क्रूरता की परिभाषा देती है। 1 जुलाई 2024 से पूर्व दर्ज मुकदमे धारा 498A के अंतर्गत ही चलते रहेंगे।

क्या तलाक का मुकदमा लम्बित रहते भरण-पोषण माँगा जा सकता है?

हाँ। कार्यवाही लम्बित रहते हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत अंतरिम भरण-पोषण माँगा जा सकता है, तथा पृथक रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के अंतर्गत, जिसने धारा 125 सी.आर.पी.सी. का स्थान लिया है। घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत भी दावा किया जा सकता है।

बच्चे की अभिरक्षा किसे मिलती है?

निर्णायक विचार बच्चे का कल्याण है, किसी भी माता-पिता का अधिकार नहीं। न्यायालय बच्चे की आयु, शिक्षा, भावनात्मक जुड़ाव तथा प्रत्येक अभिभावक की देखभाल करने की क्षमता पर विचार करता है। पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे की अभिरक्षा प्रायः, किन्तु अनिवार्य रूप से नहीं, माता को दी जाती है।

कॉल करें व्हाट्सएप