इस चैंबर में आपराधिक कार्य के अंतर्गत जमानत एवं अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र, एफ.आई.आर. निरस्तीकरण, तथा बरेली के मजिस्ट्रेट एवं सत्र न्यायालयों में आपराधिक विचारण संचालित किए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज में भी पैरवी की जाती है। 1 जुलाई 2024 से ये कार्यवाहियाँ भारतीय दंड संहिता एवं दंड प्रक्रिया संहिता के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत चलती हैं।

इस कार्यक्षेत्र में सम्मिलित कार्य

यह चैंबर आपराधिक मामलों में अभियुक्त की ओर से प्रत्येक चरण पर पैरवी करता है — एफ.आई.आर. दर्ज होने अथवा उपस्थिति का नोटिस प्राप्त होने से लेकर जमानत तथा विचारण की समाप्ति तक।

जमानत एवं अग्रिम जमानत

अग्रिम जमानत (धारा 482, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, पूर्व में धारा 438 सी.आर.पी.सी.) उस व्यक्ति द्वारा माँगी जाती है जिसे गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तारी की आशंका हो, और यह सत्र न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाती है। साधारण जमानत (धारा 480 एवं 483 बी.एन.एस.एस., पूर्व में धारा 437 एवं 439 सी.आर.पी.सी.) अभिरक्षा में लिए जाने के पश्चात माँगी जाती है।

न्यायालय प्रायः अपराध की प्रकृति एवं गम्भीरता, अभियुक्त का पूर्व इतिहास, फरार होने अथवा साक्ष्य से छेड़छाड़ की सम्भावना, तथा विवेचना की स्थिति पर विचार करता है।

एफ.आई.आर. निरस्तीकरण

एफ.आई.आर. को उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत चुनौती दी जा सकती है, जो न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सुरक्षित रखती है। जिन श्रेणियों में यह शक्ति प्रयोग की जाती है, वे उच्चतम न्यायालय द्वारा स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल में निर्धारित की गई थीं।

बरेली एवं आसपास के जनपदों से उत्पन्न याचिकाएँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज में दाखिल होती हैं।

आपराधिक विचारण

बरेली के मजिस्ट्रेट एवं सत्र न्यायालयों में विचारण का संचालन — आरोप विरचन, अभियोजन साक्षियों की प्रतिपरीक्षा, बचाव साक्ष्य, धारा 351 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत अभियुक्त का बयान, तथा अंतिम बहस।

पुरानी और नई धाराओं की तुलना

विषय पुरानी धारा नई धारा
प्रथम सूचना रिपोर्ट सी.आर.पी.सी. 154 बी.एन.एस.एस. 173
पुलिस के समक्ष उपस्थिति का नोटिस सी.आर.पी.सी. 41A बी.एन.एस.एस. 35
अग्रिम जमानत सी.आर.पी.सी. 438 बी.एन.एस.एस. 482
गैर-जमानती अपराध में जमानत सी.आर.पी.सी. 437 बी.एन.एस.एस. 480
सत्र/उच्च न्यायालय की जमानत शक्ति सी.आर.पी.सी. 439 बी.एन.एस.एस. 483
डिफ़ॉल्ट जमानत सी.आर.पी.सी. 167(2) बी.एन.एस.एस. 187(3)
एफ.आई.आर. निरस्तीकरण सी.आर.पी.सी. 482 बी.एन.एस.एस. 528
विवाहिता के साथ क्रूरता आई.पी.सी. 498A बी.एन.एस. 85 एवं 86
छल आई.पी.सी. 420 बी.एन.एस. 318

एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक बात: 1 जुलाई 2024 से पूर्व दर्ज मुकदमे पुरानी संहिता के अंतर्गत ही चलते रहेंगे। अतः यह एफ.आई.आर. दर्ज होने की तिथि से तय होता है, सुनवाई की तिथि से नहीं।

एफ.आई.आर. दर्ज होने पर क्या करें

  1. एफ.आई.आर. की प्रति प्राप्त करें।
  2. बिना सलाह के शिकायतकर्ता से सीधे समझौते हेतु सम्पर्क न करें। जो कहा जाएगा वह साक्ष्य में आ सकता है।
  3. दस्तावेज एवं इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख मूल रूप में सुरक्षित रखें।
  4. अग्रिम जमानत हेतु शीघ्र सलाह लें। गिरफ्तारी हो जाने के पश्चात उपलब्ध उपचार भिन्न और प्रायः कठिन होता है।

सम्बन्धित न्यायालय

सामान्य प्रश्न

जमानत और अग्रिम जमानत में क्या अंतर है?

अग्रिम जमानत, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 के अंतर्गत, गिरफ्तारी से पूर्व उस व्यक्ति द्वारा माँगी जाती है जिसे किसी गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तारी की आशंका हो। साधारण जमानत, धारा 480 एवं 483 के अंतर्गत, गिरफ्तारी के पश्चात माँगी जाती है। अग्रिम जमानत सत्र न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय से माँगी जाती है।

सी.आर.पी.सी. की धारा 438 और 482 अब कौन सी धाराएँ हैं?

अग्रिम जमानत से सम्बन्धित सी.आर.पी.सी. की धारा 438 अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 है। एफ.आई.आर. निरस्त कराने हेतु प्रयुक्त सी.आर.पी.सी. की धारा 482 अब धारा 528 बी.एन.एस.एस. है। यह परिवर्तन 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुआ। उससे पूर्व दर्ज मुकदमे पुरानी संहिता के अंतर्गत ही चलते रहेंगे।

क्या एफ.आई.आर. निरस्त कराई जा सकती है?

एफ.आई.आर. उच्च न्यायालय द्वारा धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत निरस्त की जा सकती है, जहाँ शिकायत को सही मानकर भी कोई अपराध नहीं बनता, जहाँ कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है, अथवा जहाँ पक्षकारों ने वास्तव में समझौता कर लिया हो। केवल तथ्यों को विवादित बताने मात्र से यह उपलब्ध नहीं होती।

धारा 35 बी.एन.एस.एस. का नोटिस मिलने पर क्या करें?

धारा 35 बी.एन.एस.एस. (पूर्व में धारा 41A सी.आर.पी.सी.) का नोटिस विवेचक अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने हेतु होता है। यह गिरफ्तारी नहीं है, और उपस्थित होना प्रायः उचित रहता है, क्योंकि अनुपालन न करना स्वयं गिरफ्तारी का आधार बन सकता है। उपस्थित होने से पूर्व विधिक सलाह लें, नोटिस साथ ले जाएँ, और बिना पढ़े किसी कथन पर हस्ताक्षर न करें।

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